मनुष्य में है परमात्मा बनने की योग्यता : मनीष सागरजी महाराज,असली कर्म बंधन का कारण आत्मा का बदलता पर्याय

मनुष्य में है परमात्मा बनने की योग्यता : मनीष सागरजी महाराज,असली कर्म बंधन का कारण आत्मा का बदलता पर्याय

September 16, 2025 0 By Central News Service

रायपुर। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने मंगलवार को आत्मा के पर्याय बदलने का भेद समझाया। भेद विज्ञान साधना शिविर के तीसरे दिन उपाध्याय भगवंत ने कहा कि मनुष्य में परमात्मा बनने की योग्यता है। शरीर के अनेक अव्यव है। शरीर में सभी जड़ों को हटाकर देखें तो एक चेतन तत्व आत्मा है। ऐसा मानो आत्मा ही मैं हूं। आत्मा को मैं मानो और परमात्मा बनने की तैयारी करो।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि मनुष्य के पास असीम योग्यता है अपना विकास करने की। हमेशा अपने अस्तित्व को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य भव ही आत्म कल्याण करने के लिए मिला है। आत्मा को समझने का मौका मनुष्य भव में ही प्राप्त हो सकता है। 84 लाख योनियों में सबसे बेहतर मनुष्य योनी है।
सही जानो, सही मानो और सही जियो। अनंत काल से हम गलत जान रहे, गलत मान रहे और गलत जी रहे हैं।

ज्ञान, दर्शन, चारित्र्य की साधना करें

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि कभी भीतर में उत्साह तीव्र हो जाता है। कभी कम हो जाता है। कभी सुखी होते हैं तो कभी दुखी होते हैं। हम आत्मा के अनेक गुणों की प्रत्येक पर्याय का अनुसरण करते रहते हैं। असली कर्म बंधन का कारण है आत्मा का बदलता पर्याय। पर्याय बदलता है तो भाव बदलते हैं। भाव बदलते हैं तो राग व द्वेष होता है। क्या जानते हो, क्या मानते हो और कैसी प्रतिक्रिया दोगे ये बहुत महत्वपूर्ण है। हमें ज्ञान, दर्शन और चारित्र्य की साधना करना चाहिए।

आत्मा के गुण फिक्स, बदलता है पर्याय

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि आत्मा में चारित्र्य गुण है। आत्मा आचरण करती है। क्रोध,मान, माया, लोभ इच्छाएं आदि होते हैं। आचरण अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी हो सकते हैं।आत्मा में उत्साह पैदा होना आत्मा का पुरुषार्थ है। आत्मा कभी तृप्त होती है, कभी अतृप्त होती है। कभी सुखी तो कभी दुखी होती है। आत्मा के गुण फिक्स होते हैं। पर्याय बदलती रहती है। आपकी मान्यता यदि किसी चीज के प्रति बढ़ी हुई है। चाहे व्यक्ति या वस्तु के बारे में हो। यह आत्मा की ही शक्ति है। मान्यताएं बदलती रहती है। दर्शन गुण फिक्स है।

सुखी होना है तो सही मान्यताएं बनाओ

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
दर्शन गुण की पर्याय बदलती रहती है। मान्यताएं अच्छी व बुरी होंगी तो राग व द्वेष होगा। राग होगा तो इच्छाएं होगी। इच्छाएं होगी तो दुखी होंगे। जब सुखी होना है तो सही मान्यताएं बनाओ। जो देख रहे वह जड़ है, जिसमें सुख नहीं है। आपके अंदर सुख नाम का गुण है। सत्य को ज्ञान से जानना चाहिए और मान्यता सही करना चाहिए। मान्यता सही हो जाएगी तो हमारा सपोर्ट करेगी। ज्ञान कभी गलत भी होता होगा तो मान्यता हमें समझाएगी।

प्रतिक्रिया करने की शक्ति है चारित्र्य

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि चारित्र्य गुण में भी पर्याय बदलती रहती है। भाव ही चारित्र्य गुण की पर्याय है। आप किसी को देखकर मुस्कुराए, जिसे आप पसंद करते हो। यह उसके प्रति राग है। आगे बढ़े एक दूसरा व्यक्ति मिला जिसे पसंद नहीं करते और मुस्कुराए नहीं यह द्वेष है। चारित्र्य मतलब प्रतिक्रिया करने की शक्ति होती है। आत्मा में चारित्र्य गुण की भी पर्याय बदलती रहती है।