गुणों को बढ़ाना है तो वस्तु नहीं, दोषों को घटाओ,परमात्मा से सदैव विवेक जागृत रहने की प्रार्थना करें : मनीष सागरजी महाराज

गुणों को बढ़ाना है तो वस्तु नहीं, दोषों को घटाओ,परमात्मा से सदैव विवेक जागृत रहने की प्रार्थना करें : मनीष सागरजी महाराज

September 8, 2025 0 By Central News Service

रायपुर। उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी परम पूज्य श्री मनीष सागर जी महाराज साहब ने कहा कि हमेशा विवेक जगृति रहना चाहिए। अपने अतीत के कुसंस्कारों से अपने वर्तमान के विवेक को लड़ाना है। विवेक यदि शक्तिशाली होगा तो अतीत के कुसंस्कारों को हरा देगा। क्रोध आ भी जाए तो विवेक ही हमें रोकेगा। पुण्य का उदय अधिक ना हो तो चलेगा, लेकिन सदैव विवेक जागृत रहना चाहिए।

टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्यक्ष भगवंत ने कहा कि
परमात्मा से बस एक ही प्रार्थना करना कि मेरा विवेक जागृत रहे। पाप का उदय हो और विवेक जागृत हो तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। पुण्य का उदय हो और विवेक जागृत नहीं है तो सब कुछ ठीक होकर भी कुछ नहीं बचेगा। ना पाप के उदय से बचने की कामना करो। ना पुण्य के उदय की प्राप्ति की कामना करना है। परमात्मा से कामना बस विवेक जागृत होने की करना है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि हर व्यक्ति के पास जीवन में दो रास्ते हैं। पहला गुणों का विकास करो। दूसरा दोषों का विनाश करो। हमें गुणों का विकास ही करना है। दोष जाएंगे तभी गुण आएंगे।वस्तु का त्याग कर गुणों को नहीं बढ़ा सकते। उपवास करते हैं तो वस्तु का त्याग करते हैं। वस्तु का त्याग करने को ही साधना मान बैठे हैं। वस्तु का त्याग तो कर देते हैं लेकिन आसक्ति का त्याग नहीं कर पाते। राज व द्वेष का त्याग नहीं हो पता। सही मायने में आसक्ति का त्याग करना चाहिए।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि धर्म का संबंध आहार के त्याग से नहीं है। धर्म तो आसक्ति के त्याग से होता है।वस्तु नहीं दोष को घटाओ, तभी गुण बढ़ेंगे। क्रोध छूटेगा तो क्षमा बढ़ेगी। संयम लेने से क्रोध छूट जाए यह संभव नहीं। भावों पर अपना नियंत्रण व भावों से शुद्धिकरण आवश्यक है। भावों का शुद्धिकरण जितना होगा उतने हमारे गुण बढ़ते जाएंगे। हम दान करें लेकिन दान की भावना ना हो। उपवास करें लेकिन आसक्ति ना छुटे तो कोई दान और उपवास करने से कोई लाभ नहीं।