जीवन को व्रतमय और पापरहित बनाना हो लक्ष्य : मनीष सागरजी,शुभ से शुद्ध भाव की यात्रा ही आत्म-विकास की साधना

जीवन को व्रतमय और पापरहित बनाना हो लक्ष्य : मनीष सागरजी,शुभ से शुद्ध भाव की यात्रा ही आत्म-विकास की साधना

September 23, 2025 0 By Central News Service

रायपुर। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में जारी चातुर्मासिक प्रचवनमाला में मंगलवार को परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने जीवन को व्रतमय और पाप रहित बनाने की सीख दी। उपाध्याय भगवंत ने कहा कि हमें अपना जीवन व्रतमय बनाना है। जीवन को पाप रहित बनाना है। बाहरी जीवन को व्यवस्थित कर आंतरिक जीवन की उन्नति का चिंतन करना है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि व्रत लेने पर त्याग करते हैं। त्याग करने पर आनंद का लेवल बढ़ना चाहिए। त्याग करने पर भार नहीं लगना चाहिए। त्याग बढ़ने पर आनंद बढ़ता जाए, यह लक्ष्य होना चाहिए। सदैव त्याग के संस्कार विकसित करना चाहिए। व्रतमय जीवन आत्मविश्वास है। हमारी सुरक्षा है, हमारा जैनत्व है। संकल्प बल इतना मजबूत हो कि विपरीत परिस्थिति में भी विवेक जागृत रहे।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि पूजा समर्पण है, व्रत प्रतिज्ञा है। पूजा हमें परमात्मा से जोड़ती है। व्रत परमात्मा से हमें एकमय करता है। यदि हम व्रत करते हैं तो परमात्मा हमारे भीतर ही हैं। व्रत परमात्मा से सीधा जुड़ाव करता है। स्वाध्याय सत्य का ज्ञान करता है। व्रत सत्य का प्रयोग कराता है। जीवन को व्रतमय बनाना है तो व्रत को बंदिश नहीं मानना है। सुदेव, सुगुरु और सुधर्म के प्रति समर्पण रहे। ये व्रत लेना चाहिए। मंदिर में परमात्मा का दर्शन, पूजन रोजाना करना चाहिए। यही सच्चा समर्पण है। समर्पण की आड़ में संसार का राग नहीं होना चाहिए।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि पहले अशुभ से शुभ भाव में आने का पुरुषार्थ करें। इसके बाद शुभ से शुद्ध भाव की ओर आने का पुरुषार्थ करें। शुभ से शुद्ध भाव की यात्रा ही आत्म विकास की साधना है। जिन शासन में जब कोई सदगुरु की शरण में जाकर धर्म श्रवण करता है। उसे सत्य की प्राप्ति होती है। सदगुरु की मान्यता को अपनी मान्यता मानता है। सत्य का ही सिद्धांत सम्यक दर्शन है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
अपने गिरते हुए भावों को बचाना है। अशुभ से शुभ भाव में आना है। धीरे-धीरे शुभ भाव से ऊपर उठकर शुद्ध भाव में आना है। यही समता भाव है। भीतर में भावों की शुद्धि के साथ बाहर में व्यवहार को ठीक करना है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में सावधान रहना है। जो मेरा नहीं और जिसमें सुख नहीं उससे आसक्ति नहीं करना है। सच्चा सुख आत्मा के कल्याण में है। भीतर ही सच्चा सुख है। बाहर दुख ही दुख है।