वास्तविक सुख बाहर नहीं भीतर आत्मा में : महेंद्र सागरजी ,संसार में राग, द्वेष व मोह रहित जीना है
September 18, 2025रायपुर। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में जारी पांच दिवसीय भेद विज्ञान शिविर का गुरुवार को समापन हुआ। धर्मसभा में उपाध्याय भगवंत आध्यात्म योगी महेंद्र सागरजी महाराज साहब ने कहा कि संसार में शरीर और भोग के चक्कर में घूमते रहते हैं। इसी को सुख मान बैठे हैं। बाहर के काल्पनिक सुख को ही हम सुख मान बैठे हैं। वास्तविक सुख आत्मा में है। इंद्रिय सुख काल्पनिक है। आत्मिक सुख वास्तविक है। आत्मिक सुख मिलेगा तो शांति सहज आएगी।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि कर्म के द्वारा हमारा पूरा ध्यान शरीर में होता है। शरीर के भीतर जो आत्मा है, उसकी तरफ हम सोच भी नहीं पाते। हमारा पूरा ध्यान अघातीय कर्म में लगा रहता हैं। कामना हमेशा रहती है पुण्य का उदय बना रहे। अच्छी व्यवस्था मिलती रहे। मन के अनुकूल सब हो। सब पुण्य हो, लेकिन पुरुषार्थ पाप का करते रहते हैं। घातीय कर्म की कामना नहीं करते हैं। कर्मों का बंध निरंतर होता रहता है। कर्म हमारे गुणों का घात करते हैं। हमारे गुणों को विकसित नहीं होने देते। ये कर्म ही संसार में परिभ्रमण कराते रहते हैं।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि मैं आत्मा हूं इस सोच से आगे बढ़ेंगे तो आत्म कल्याण की दिशा में आगे बढ़ेंगे। सहज शांति का अनुभव होगा। आकुलता में सुख नहीं है। निराकुलता में सुख है। जीवन में कोई विकल्प नहीं हो। राग, द्वेष और मोह यह हमारे संताप, दुखों की जड़ है। राग व द्वेष को महत्व नहीं देना है। राग और द्वेष बाहर के हैं। महत्व आत्मा का है। आत्मा शुद्ध अवस्था में रहे। राग द्वेष रहित आत्मा रहे। इस पर सदैव लक्ष्य बनाना है। राग व द्वेष करना भी चारित्र्य है। राग व द्वेष नहीं करना भी चारित्र्य है। राग व द्वेष करना मिथ्या चारित्र्य है। राग व द्वेष नहीं करना सम्यक चारित्र्य है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
भेद विज्ञान का पहला लक्ष्य अपनी समझ को देव, गुरु और शास्त्र की समझ के माध्यम से अच्छी बनाना है। समझ और मान्यताओं को ठीक करना है। भेद विज्ञान का दूसरा उद्देश्य समझ और मान्यता ठीक हो जाए तो उसे मान्यता के आधार पर संसार को देखना है। संसार में राग, मोह व द्वेष रहित जीना है। दृष्टिकोण को सम्यक बनाना है। सम्यक दृष्टिकोण से ज्ञान को सम्यक बनाना है। वस्तु में राग द्वेष उत्पन्न किए बगैर जीना है।


