अपने भीतर के महावीर को जगाने का प्रयास करें:मनीष सागर जी,जीवन का आनंद लेना हो तो जीवन को मर्यादित कर लो
August 24, 2025
रायपुर। टैगोर नगर पटवा भवन में पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के पांचवे दिन रविवार को परम पूज्य उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने कहा कि जीवन में दूसरों को नहीं कर्मों को जीतना लक्ष्य होना चाहिए। हमें दूसरों को नहीं सुधारना है, स्वयं को सुधारना है। अज्ञान को मिटाना लक्ष्य है। समता की पराकाष्ठा को छूना है। अपने भीतर के महावीर को जगाने का प्रयास करें।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि क्षमा का कीर्तिमान प्रभु महावीर के अलावा कोई दूसरा नहीं मिलेगा। वैराग्य का कीर्तिमान और कहीं नहीं मिलने वाला। सहजता का जीवंत रूप और कहीं देखने को नहीं मिल सकता। प्रभु महावीर के जीवन वृतांत को कल्पना मान करके मत सुनो। इसे सुनकर अपने जीवन में आत्मसात करो। लक्ष्य हो हमें अपना जीवन प्रभु महावीर के जैसा बनाना है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
भगवान महावीर सत्य का प्रतिरूप है। उनके प्रति श्रद्धा हमारे जीवन को ऊपर उठा देगी। इसमें लाभ अपना है। इसलिए भगवान महावीर को सत्य माने और सत्य मान करके उनको स्वीकार करें। प्रभु महावीर कहते हैं आपके भीतर भी एक महावीर बैठा है। तो निश्चित तौर पर वो भी सत्य होगा। प्रभु महावीर को देखो और स्वयं को देखो। महावीर को महावीर बनता हुआ देखो। स्वयं को महावीर बनाने का संकल्प कर लो। ऐसा चिंतन ऐसा लक्ष्य हो।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
आज प्रभु महावीर का जन्मोत्सव कहीं ना कहीं ल,कभी ना कभी किसी जन्म में हमारे लिए निर्वाण तक की गौरव गाथा बन जाएगा। वो निर्वाण किसी और का नहीं होगा,वो निर्वाण हमारा स्वयं का होगा। यह जीव स्वयं सिद्ध, बुद्ध और मुक्त बनेगा। बस आवश्यकता इस बात की है कि प्रभु महावीर के जीवन को बस अतिशयोक्ति मत मानना। उनके जीवन को सत्य मानना है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
हम इतना नीचे गिर गए हैं कि हमको ऐसा लगता है कि शायद वो होगा ही नहीं। यह हमारी पामरता है। हमारी मन की गरीबी है। हमारा नीचे पतन है। इसलिए हमको इतना ऊपर दिख रहा है कि हम बोल रहे हैं कि होगा ही नहीं। छदमस्त लोगों की बातों को हम सत्य मान लेते हैं। बस एक ही चीज मान के चलना कि श्रद्धा में बड़ी ताकत है। इस श्रद्धा के बल पर जीवन विकास का आदर्श रूप भगवान महावीर में देखने को हमको मिल सकता है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
जिसका सेल्फ कंट्रोल होता है। जिसका मन नियंत्रित है उसके लिए सब काम आसान है। जिसका मन कंट्रोल में नहीं है। तो वो व्यक्ति के लिए हर चीज कठिन है। विवेकानंद जी ने कहा है कि जहां भय है वहां द्वेत है। द्वेत मतलब क्या ये सही कि वो सही? या ये करूं कि वो करूं? भय में ऐसे ही चक्कर चलता है। उसको द्वंद भी बोलते हैं। जहां भय है वहां द्वेत है और जहां द्वेत है वहां एक मात्र निर्णय हो जाए कि यही सत्य है। ये हो नहीं सकता। इसलिए भय मिटाना बहुत जरूरी है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
अल्प संयम में जिओ लेकिन जिओ संयम में। संयमित हो जाओ। अल्प संयम में भले ही अपने जीवन को अभी सबका त्याग नहीं कर सकते। यदि जीवन का आनंद लेना हो तो जीवन को मर्यादित कर लो। सीमित कर लो। चरित्र के पथ पर अग्रसर हो जाओ। दो साधना करो। एक द्रव्य साधना और दूसरी भाव साधना। द्रव्य साधना से द्रव्य क्रिया करोगे और भाव साधना से अपने भावों की शुद्धि करोगे। द्रव्य साधना को आधार बना करके भाव साधना तक पहुंचाओ।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि अभी अपन द्रव्य पूजा करने के मंदिर जाते हैं। भाव पूजा तब होगी जब पूज्य को देखते देखते हमारे भीतर में उनके ऐसे गुणों का प्रकटीकरण हो जाए। उनकी क्षमा का विचार करते करते हमारी क्षमा की ताकत बढ़ जाए। हम सब भी जब जिन शासन की छत्रछाया में आते हैं ना तो आनंद आ जाता है। या तो परमात्मा के समान एकदम निर्लिप्त कमल के समान विकसित हो जाओ और ना हो सको तो कम से कम पद्म सरोवर में रहो। यानी जिन शासन के सीमा में रहो।
भगवान महावीर के जन्म वाचन पर उमड़ा उल्लास
दोपहर को विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञान वल्लभ उपाश्रय में उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज साहब ने भगवान महावीर स्वामी के जन्म प्रसंग का वाचन किया। इसे सुनने बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। इस मौक़े पर माता त्रिशला द्वारा देखे गए चौदह सपनों को बधाने व उन्हें माला पहनाने के लिए लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। भगवान के पालने को झुलाने का लाभ दीपक निमाणी परिवार को मिला । रात्रि में उन्होंने भक्ति संध्या का आयोजन किया।


