हमेशा दुःखी रहता है मन का गरीब : मनीष सागरजी,मन से अमीर बनो, सदैव सुख और संतोष रहेगा
August 23, 2025
रायपुर। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के चौथे दिन शनिवार को परम पूज्य उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने कहा कि धन की बजाय मन का गरीब व्यक्ति हमेशा दुखी जीवन जीता है ।
उन्होंने कहा कि गरीबी धन की नहीं, गरीबी मन की होती है। मन को गरीब होने में ज्यादा देर नहीं लगती। मन इतना तरल है कि तुरंत बदल जाता है। मन की यदि एक इच्छा पूरी नहीं होती तो उदास हो जाता है। मन कंगाल हो जाता है। हम पुण्य के उदय में जो मिलता है वह नहीं देखते, जो नहीं मिलता उसे देखते हैं।इसलिए मन को गरीब रहने की आदत पड़ गई है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जितने लोग भी नकारात्मकता में जीते हैं। निंदा व बुराई करते रहते हैं। जितने दोष दृष्टि में निपुण हैं। उनमें खूबी है कि वे मन के गरीब लोग हैं। उन्हें दूसरे के दोष दिखाई देते हैं। ऐसे में दुखी व दरिद्र जीवन व्यतीत होता है। मन से कंगाल और दरिद्र जीव कभी सुखी नहीं रहता। परमात्मा से एक ही प्रार्थना करनी चाहिए कि मेरी मन की अमीरी आ जाए। हर हाल में संतुष्ट रहूं।।दुख हो या सुख हर हाल में आनंद में रहूं।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
परमात्मा के प्रति सदैव गहरा समर्पण होना चाहिए। परमात्मा की आज्ञा का सदैव पालन करना चाहिए। इससे हम अपने दैनिक जीवन में परमात्मा के मार्गदर्शन को अपनाते हुए, सच्चाई और नैतिकता के पथ पर अग्रसर हो सकें। जब हम समर्पण और आज्ञाकारिता के माध्यम से, अपने आत्मिक विकास की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हैं। जो हमें शांति और संतोष की अनुभूति कराता है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
सत्य का संग ही वास्तव में सत्संग का आधार है। सत्य का संग करना हो,आत्मा का संग करना हो तो हमेशा सत्संग करो।
जब सत्संग का रंग हमारे जीवन में समाहित होता है, तो यह न केवल हमारे विचारों और भावनाओं को शुद्ध करता है, बल्कि हमें एक नई दृष्टि और दिशा भी प्रदान करता है। सत्संग के माध्यम से हम अपने भीतर की गहराइयों में जाकर आत्मिक जागरूकता को बढ़ा सकते हैं।
जब हम सच्चाई के साथ जुड़ते हैं,तो यह हमारे जीवन में एक गहरा और सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है।


