जागृति ही मुक्ति का द्वार : मनीष सागरजी,जीवन में पाप से बचकर पुण्य में लगने का प्रयास होना चाहिए

जागृति ही मुक्ति का द्वार : मनीष सागरजी,जीवन में पाप से बचकर पुण्य में लगने का प्रयास होना चाहिए

August 13, 2025 0 By Central News Service

रायपुर। जागृति ही प्रमाद से मुक्ति है। जागृति ही मुक्ति का द्वार है। जैसे-जैसे जागृति बढ़ेगी वैसे-वैसे प्रमाद छूटेगा। जैसे-जैसे प्रमाद छूटेगा, वैसे-वैसे जागृति बढ़ेगी। जो भी कार्य करो पूरे होशोहवास में करो। परमात्मा भी यही कहते हैं। आपको जीवन भी जागृत रहकर जीना चाहिए। जागृति लाने के लिए अवसर हर क्षण है। जागृति खोने के लिए भी अवसर हर क्षण है। कभी हम खो जाते हैं,वि कभी हम जाग जाते हैं। सोने की फ्रीक्वेंसी अधिक है। जागने की फ्रीक्वेंसी कम है। सही साधक वही है, जो अभ्यास करता है कि मुझे जागना है। यह बातें बुधवार को टेगौर नगर स्थित पटवा भवन में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में परम पूज्य उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने कही।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जागृत रहना सभी को आता है। सभी के विषय अलग-अलग है। किसी का विषय धन है। किसी का विषय परिजन है। किसी का विषय राष्ट्र व समाज है। किसी-किसी भव्य आत्मा का विषय आत्मा बन जाता है। वह आत्मा के प्रति सावधान हो जाता है। संसार के लिए बहुत जी लिया बस अब आत्मा के लिए जीना है। यह जागृति आ जाती है तो परमात्मा भी कहते हैं ऐसे जीव को लंबे समय तक संसार में कोई रोक नहीं सकता। जागृति ही मुक्ति का द्वार है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जागृति सबसे पहले पाप से बचने के लिए लाना है। दूसरा पुण्य में लगाना है। तीसरा तत्व ज्ञान में डूबना है। चौथा सम्यक्त्व में रमना है। पांचवां वृत्ति में विचरण अर्थात संयम में रहना है। वृत्ति से आगे बढ़कर जागृति में जीना है।।जब जागृति में रहना आ जाएगा तो आत्मा में रहना होगा। यह कर्म साधना का है। इसी क्रम से अनंत ज्ञानी मुक्त हुए हैं। जब राज हावी होता है तो पाप फिर पाप नहीं लगता। राग थोड़ा मंद होता है तो पाप फिर पाप लगने लगता है। जैसे-जैसे भाव करते हैं वैसा कर्म बंधन होता है। जैसा कर्म बंधता है वैसा फल मिलता है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि शरीर यहीं छूट जाता है। हम आत्मा चले गए जाते हैं। हमारे साथ पूरे जन्म का लेखा-जोखा ले जाते हैं। कर्म एक्टिव होकर फिर फल देते हैंन अनजाने में हमसे एक भूल हो जाती है कि पाप के उदय में बहुत इतराते हैं और पुण्य के उदय में घबराते हैं। हम मान बैठते हैं मैं ही सबसे शक्तिशाली था। मैं ही शक्तिशाली हूँ और हमेशा रहूंगा। इसी के चक्कर में कर्म बंधन की राह पर चले जाते हैं। हम पाप का विकराल बंधन कर लेते हैं। पाप का बंधन हंसते-हंसते बांधते हैं और रोते रोते भी चुका नहीं पाते हैं।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि गृहस्थ जीवन में वैराग्य भाव से रहते हुए पाप से बचकर जीवन जीना होगा। आगे महापर्व पर्युषण पर्व आरंभ होगा। अगले 16 दिन पाप रहित होकर जीने का अवसर है। अभ्यास करने का पर्युषण महापर्व के आठ दिन हैं। उसके पहले के आठ दिन कुल 16 दिन सभी के पास हैं। 16 दिनों में पाप कम से काम करना है,यह अभ्यास होना चाहिए। आनंद अधिक से अधिक जीवन में बढ़ता है। घर में रहकर वैराग्य भाव के साथ जीने का अभ्यास करना है। पाप से बचकर पुण्य में लगने का प्रयास करना है।