गलत आदतों को समय रहते छोड़ना ही समझदारी : मनीष सागर जी महाराज

गलत आदतों को समय रहते छोड़ना ही समझदारी : मनीष सागर जी महाराज

September 27, 2025 0 By Central News Service

रायपुर। विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चातुर्मासिक प्रवचनमाला का क्रम जारी है। शनिवार को परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने धर्मसभा में गलत आदतों का त्याग करने की सीख दी। उपाध्याय भगवंत ने कहा कि गलत आदतों को समय के साथ छोड़ना चाहिए। परिपक्वता के साथ गलत आदतों को छोड़ना समझदार व्यक्ति की निशानी है। बुरी आदतें समझ में आते जाएं तो उसे छोड़ने जाएं। बुरी आदतें एक साथ नहीं छोड़ सकते। जितना आप सुधर सकते हैं खुद को सुधारते जाएं। ज्ञान के साथ संकल्प होगा तो मन विचलित नहीं होगा। धीरे-धीरे मन मजबूत होगा और गलत आदतें छूटती जाएगी।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि
हिंसा, झूठ, चोरी, अपरिग्रह और अब्रह्मचर्य इन पांच पापों का त्याग करते जाएं। पूर्ण त्याग नहीं कर सकते तो कम से कम अनावश्यक ना हो यह प्रायस रहे। जीवन में हिंसा से बचो। जिसके बिना जीवन है कम से कम उन हिंसा का त्याग करो। झूठ से बचो। कम से काम सामान्य स्थिति में झूठ मत बोलो। प्रमाणिकता के साथ जीवन जीना है। जीवन में चोरी से बचो। विवाहित हो तो स्व स्त्री व स्व पुरुष में गमन कर ब्रह्मचर्य का पालन करो। धीरे-धीरे शील व्रत की ओर आओ। परिग्रह में भी धन,धान्य, जमीन आदि जीवन में जितनी आवश्यक हो उतनी सीमा रखो। जरूरत से ज्यादा वस्तुओं के संग्रह का राग मत रखो।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जीवन जीना एक कला है। जीवन भर आत्म आनंद में रहना चाहिए। मरने के पूर्व भी आनंद आना चाहिए। जीवन भर ज्यादा बसा लिया है तो धीरे-धीरे समेटते जाओ। नहीं तो मति के साथ गति भी अच्छी नहीं होगी। परिग्रह शून्य नहीं कर सकते तो सीमित कर लो। मन यदि नहीं माने,मचलता है तो संकल्प के साथ मजबूत बनाओ। मन स्थिर हो जाए और आनंद में रहो। माइंडसेट है तो आप सीमित में भी जी लोगे। मन को मना लोगे समय रहते तो मन नखरे नहीं करेगा। वरना मन मचलते ही रहेगा। स्वार्थ बढ़ेगा तो मन शुभ कार्य करेगा। परमात्मा के बताए मार्ग पर चलने का समर्पण नहीं रहेगा।

जो उद्देश्य बनाकर जीवन जीता है,वह सफल होता है : महेंद्र सागरजी महाराज

धर्मसभा में उपाध्याय भगवंत आध्यात्म योगी महेंद्र सागरजी महाराज साहब ने समझाया कि जीवन में उद्देश्य होना चाहिए। उद्देश्य बनाकर जो जीवन जीता है,वही सफल होता है। उद्देश्य में बाधक कार्यों को हटाना चाहिए और साधक कार्यों को अपनाना चाहिए। जिसका उद्देश्य नहीं है उसे जो मिलेगा वही कर लेगा। परमात्मा कहते हैं जीवन का उत्थान करना है तो व्रत धारण करना होगा। अपने जीवन को नीचे गिरने से बचना ही व्रत है। व्रत जीवन जीने की पॉलिसी है। हिंसा, चोरी,झूठ, अपरिग्रह और अब्रह्मचर्य दुर्गति में ले जाएगा।