अहंकार मिटाना है तो दूसरों को श्रेय दें : मनीष सागरजी,,,,लक्ष्य को पाने मन हो मजबूत और परिस्थितियों से घबराना नहीं

अहंकार मिटाना है तो दूसरों को श्रेय दें : मनीष सागरजी,,,,लक्ष्य को पाने मन हो मजबूत और परिस्थितियों से घबराना नहीं

August 21, 2025 0 By Central News Service

रायपुर। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन गुरुवार को परम पूज्य उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने अहंकार को त्यागने की सीख दी। उपाध्याय भगवंत ने कहा कि हमें अपने जीवन में सद्गुणों को धारण करना है। इसका शुभ संकल्प करें। जीवन में अहंकार को मिटाओ और सत्य को पाओ, यह लक्ष्य होना चाहिए।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि हमें अपने जीवन में सबसे पहले यह शिक्षा लेना आवश्यक है। अहंकार मिटेगा तभी हम सत्य को पाने लायक बनेंगे। अहंकार का हिमालय हमारे भीतर में है। आवश्यकता है बस पर्दा हटाने की। अहंकार सबके भीतर है। मौका पड़ने पर हमारा मन शांत रहे। हमारा बर्ताव, व्यवहार अपने बड़े बुजुर्गों के प्रति वैसा ही रहे जैसे छोटों का होना चाहिए। तब मानना की भीतर अहंकार नहीं है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि अहंकार को दबाकर जीवन का विकास करते जाओ। जब-जब भी अच्छा काम करें उसका श्रेय अपने देव,गुरु और धर्म को दें। देव,गुरु और धर्म की कृपा से ही अच्छा हुआ है। अहंकार रूपी राक्षस ऐसे ही दबेगा जब आप अच्छे कार्य का श्रेय स्वयं ना लेकर देना सीख जाएंगे। अपनी प्रकृति के साथ संघर्ष करें। अपने व्यवहार को बदलें। वक्रता की जगह सरलता लाने का प्रयास करें। सरलता और अज्ञान रहेगा तो दिक्कत नहीं है। वक्रता और अज्ञान रहेगा तो बहुत खतरनाक है। गुण ग्रहण व दोष निवारण की बात आए तो ऐसे बने जैसे गौतम स्वामीजी भगवान महावीर स्वामी का समक्ष बन जाते थे।

उपाध्याय भगवंत ने कल्पसूत्र का वांचन प्रारंभ किया। श्री कल्पसूत्र के माध्यम से जीवन जीने की कला की सीख दी। उन्होंने कहा कि कल्पसूत्र हमें जीवन में नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाता है। कल्पसूत्र का हमें बहुत श्रद्धा और जिज्ञासा के साथ श्रवण करना है। इससे अपने जीवन को अच्छा बनाना है। हम प्रयास अनेकों बार करते हैं। हर साल करते हैं। कहीं ना कहीं कुछ कमजोरी रह जाती है। वापस एक अवसर है अपने को बदलने का प्रयास करें।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि हमें लगता है कि हमें जीवन जीना आता है। फिर भी हम गलतियां कर बैठते हैं। बाहरी विकास तो कर लेते हैं लेकिन भीतर का विनाश करते हैं। स्वभाव व विचारों को बिगाड़ते हैं। अज्ञान को बढ़ाते हैं। मान्यता को न मानकर जीवन जीकर चले जाते हैं। ऐसे जीव का कोई ठिकाना नहीं होता। गति गति में भटकता रहता है। अपने विकारों को ठीक करने, बाहरी विकास के साथ आंतरिक विकास करने का श्री कल्पसूत्र हमें संदेश देंगे। कैसे हमें हमारे विचारो, भावों, ज्ञान को निर्मल करना है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि कोई भी अच्छा कार्य करें उसमें दो प्रकार की बढ़ाएं आती है। एक बाहर की बाधा आती है और दूसरी अंदर की बाधा आती है। मन कभी कमजोर पड़ जाता है। बाहर की परिस्थितियां हम पर हावी हो जाती है। हमें अच्छे कार्य का प्रारंभ करते समय संकल्प को बहुत दृढ़ करना चाहिए। आंधी हो या तूफान हम आगे बढ़ते जाएंगे। अपनी मंजिल तक पहुंचने के संकल्प की ताकत मजबूत होनी चाहिए। संकल्प दृढ़ होगा तभी लक्ष्य हासिल होगा।