खुद में ही है खुदा : मनीष सागरजी,निर्वाण तभी संभव, जब आत्मा पापों से निर्लेप होगी

खुद में ही है खुदा : मनीष सागरजी,निर्वाण तभी संभव, जब आत्मा पापों से निर्लेप होगी

August 18, 2025 0 By Central News Service

रायपुर। टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में परम पूज्य उपाध्याय भगवंत युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने आज कहा कि भगवान महावीर के पास जितने आए, वह सब उनको ही भगवान नहीं मानते रहे। वह स्वयं भगवान बनते चले गए। 11 के 11 गणधर आए। उन्होंने प्रभु महावीर को भगवान मानकर उनके प्रति अपने आपको समर्पित किया। अंत में जाकर वे सभी स्वयं परमात्मा बन गए। यानि खुदा जो है वो खुद में ही है। हमें यह ध्यान रखना है। खुद ही खुदा हो। मतलब स्वयं आत्मा ही परमात्मा है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जब प्रमाद में आ जाते हो तो अपनी असली पहचान भूल जाते हो। अपनी पहचान भूल गए, इसलिए ही प्रमाद करते रहते हो। प्रमाद से राग आदि करते हो। रागादि से फिर संसार बढ़ता है। कर्म बंधते हैं। पाप बढ़ता है। आत्मा में लेप बढ़ता है। निर्वाण तभी संभव है, जब आत्मा निर्लेप होगी।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि मैं परमात्मा स्वरूपी आत्मा हूं।अपनी पहचान को याद रखें। उसका अनुभव करने का प्रयास करें। ज्ञानी बोलते हैं कि जिस समय इस आत्मा को अपने स्वरूप का ज्ञान होता है तो रागादियों को खदेड़ना नहीं पड़ता। राग आदि अपने आप समझ जाते हैं कि यहां पर अब अपने लिए जगह नहीं है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जिन शासन में दो शैली होती है। एक होती है राग आदि को हटाओ। दूसरी होती है कि आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानो और उसमें लीन हो जाओ। दोनों तरह के पुरुषार्थ करते रहें। एक तरफ रागादि छोड़ने की भावना करें और उसका उपाय यही है कि आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचाने। कर्म बंधन का कारण आपका अज्ञान है। इस अज्ञान से मुक्त हो जाना ही आपकी साधना है। यह पहचाना है कि मैं आत्मा हूं और परमात्मा बनने योग्य आत्मा हूं। हम अज्ञानवश बाहर में राग आदि पाप करते हैं। हमें इस अज्ञान से जागने की ही साधना करना है। अज्ञान से जो जाग जाएगा,उसके ज्ञान में सत्य आ जाएगा। यहीं से कर्म बंधन से मुक्ति की शुरुआत होती है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जब पाप कम होते जाते हैं तो आत्मा से एक-एक करके लेप निकलते जाता हैं। अंत में जाकर आत्मा जिस स्वरूप को पहचानती है,उस स्वरूप के रूप ही हो जाती है। राग आदि चले जाते हैं। पाप कर्म अपने आप चले जाता हैं। आत्मा स्वयं परमात्मा स्वरूप थी,वह परमात्म स्वरूप प्रकट हो जाता है। यही साधना करने के लिए अपने को जिनशासन मिला है।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जितने अनंतों केवली हुए उन्होंने यही किया है। अब यह साधना करने के लिए जब जब हम तप करें, त्याग करें, पर्युषण आदि मनाएं, कुछ भी करें। बस हमारा एक ही धेय हो स्वयं को पहचानना है। मैं कैसा हूं? मैं परमात्मा स्वरूप हूं। उस स्वरूप तक को पहचानना है।