बच्चों की पढ़ाई राजनीति का मंच नहीं, उनका भविष्य है… राजनीति हस्तक्षेप पर गंभीर सवाल.. बच्चों को बेहतर भविष्य चाहिए…
October 10, 2026संपादक मनोज गोस्वामी
महासमुंद 10 अक्टूबर 2026// शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप पर गंभीर सवाल, स्कूल बच्चों के भविष्य की नींव रखने वाले संस्थान हैं। यहीं वे ज्ञान अर्जित करते हैं, शिक्षक से संस्कार सीखते हैं और अपने सपनों को दिशा देते हैं। इसलिए स्कूलों की पहली जिम्मेदारी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना और उनके शिक्षण समय की रक्षा करना है।
छत्तीसगढ़ में यह सवाल गंभीरता से उठना चाहिए कि यदि सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को बार-बार राजनीतिक या सरकारी आयोजनों में बुलाया जाता है और इससे उनकी नियमित कक्षाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका नुकसान किसे उठाना पड़ता है? उत्तर स्पष्ट है—बच्चों को और उनके भविष्य को।
किसी भी राजनीतिक दल या सरकार का आयोजन बच्चों की शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण नहीं माना जाना चाहिए। विद्यार्थियों को राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का हिस्सा बनाने के बजाय पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल, विज्ञान गतिविधियों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और आधुनिक कौशल से जोड़ना अधिक जरूरी है।
यह प्रश्न किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि शिक्षा की प्राथमिकताओं का है।
यदि किसी आयोजन में विद्यार्थियों की सहभागिता का स्पष्ट शैक्षणिक उद्देश्य हो, वह आयु-उपयुक्त हो और उनकी सुरक्षा, गरिमा तथा नियमित पढ़ाई प्रभावित न हो, तो उसका औचित्य समझा जा सकता है। लेकिन यदि बच्चों को केवल भीड़ बढ़ाने, मंच की शोभा बढ़ाने या उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कक्षाओं से बाहर किया जाता है, तो ऐसी व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक है।
बच्चे किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं हैं। वे देश और प्रदेश का भविष्य हैं।
शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी नेताओं के कार्यक्रमों में भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक हों, नियमित कक्षाएं संचालित हों, शिक्षा की गुणवत्ता बनी रहे और बच्चों का बहुमूल्य समय अनावश्यक रूप से नष्ट न हो।बच्चों को रात को दिया जलाने स्कूलों में बुलाया जा रहा है अगर रात को किसी छात्र छात्राओं की साथ कुछ घटनाएं हो जाती है तो फिर किसकी जिम्मेदारी होती,दिन भर बड़े बड़े रंगोली बनवाया जा रहा है इतनी धूप में सिर्फ बीजेपी के चेहरा चमकाने का काम स्कूली छात्रों से करवाया जा रहा है और पालक, शिक्षक, मूकदर्शक बने बैठे है।
आए दिन छात्र-छात्राओं के ऊपर चाकू बाजी,एसिड अटैक के विभिन्न घटनाएं होने के बावजूद, नाबालिग बच्चों का छत्तीसगढ़ में नशा के गिरफ्त में होना,चाकू,तलवार लेकर खुले आम घूमना और छत्तीसगढ़ के पुलिस और छत्तीसगढ़ के शासन प्रशासन एवं सरकार बच्चों के साथ खिलवाड़ करते नजर आ रही है जिसे तुरंत बंद किया जाए बच्चों को सिर्फ स्कूल में पढ़ाई करने का अधिकार दिया जाए ना की राजनीति करने का संविधान का अनुच्छेद 21A छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। अनुच्छेद 39(ई) और 39(एफ) राज्य को बच्चों के स्वास्थ्य, शक्ति और अवसरों की रक्षा तथा उनके स्वस्थ विकास और गरिमा के अनुरूप परिस्थितियां सुनिश्चित करने की दिशा देता है। ये प्रावधान नीति-निर्देशक तत्वों में हैं, जबकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 विद्यालयों में बच्चे-केंद्रित शिक्षा और नियमित शिक्षण व्यवस्था पर बल देता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी समग्र, सुरक्षित, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को प्राथमिकता देती है। इसलिए विद्यार्थियों को राजनीतिक आयोजनों में शामिल करने से पहले उनके संवैधानिक अधिकारों, सुरक्षा, गरिमा और शैक्षणिक हितों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
सरकार और प्रशासन से कुछ सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए—
क्या स्कूल का प्रत्येक शैक्षणिक दिन महत्वपूर्ण नहीं है?
क्या बच्चों को राजनीतिक आयोजनों में बुलाने से पहले उनकी पढ़ाई पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाता है?
क्या अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन समितियों की राय ली जाती है?
क्या बाधित हुए शिक्षण समय की भरपाई की जाती है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या हम बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल भेज रहे हैं या राजनीतिक आयोजनों की भीड़ का हिस्सा बनाने के लिए?
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपनी गतिविधियां संचालित करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और गरिमा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है; इन अधिकारों पर संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत युक्तिसंगत प्रतिबंध भी लागू होते हैं। इन अधिकारों का प्रयोग विद्यार्थियों के शिक्षा-अधिकार और बाल संरक्षण संबंधी दायित्वों के अनुरूप होना चाहिए।
अब आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ में सभी राजनीतिक दल और सरकारें एक साझा संकल्प लें—
स्कूलों को राजनीति का मंच नहीं बनाया जाएगा।
विद्यार्थियों के शिक्षण समय को अनावश्यक आयोजनों के लिए बाधित नहीं किया जाएगा।
बच्चों को किसी राजनीतिक दल के प्रचार या शक्ति-प्रदर्शन का साधन नहीं बनाया जाएगा।
सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।
किसी नेता के कार्यक्रम में कुछ घंटों की भीड़ से राजनीति को भले ही तात्कालिक लाभ मिले, लेकिन एक बच्चे की पढ़ाई में हुई क्षति उसके सीखने और शैक्षणिक प्रगति को प्रभावित कर सकती है।
नेताओं की तस्वीरें कुछ दिनों में पुरानी पड़ जाती हैं, लेकिन बच्चों की शिक्षा उनके पूरे जीवन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसलिए अब आवाज उठाना जरूरी है—
बच्चों को मंच नहीं, पुस्तक चाहिए।
बच्चों को नारे नहीं, शिक्षा चाहिए।
बच्चों को भीड़ नहीं, बेहतर भविष्य चाहिए।
आइए, शिक्षा को राजनीति से ऊपर रखने की मांग करें और छत्तीसगढ़ के हर विद्यार्थी के शिक्षण समय, अधिकार और भविष्य की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 21A, बच्चों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 में निहित बाल-अधिकार संबंधी दायित्वों का पालन सुनिश्चित करें।
और शासन प्रशासन से ये मांग है कि सभी स्कूलों में जो निःशुल्क किताब मिलते है उसे अब तक कुछ स्कूलों में क्यों नहीं बाटा गया है उसका जांच करके तुरंत वितरण करने की व्यवस्था करें।


